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40 पीर की करामाती मजारें ~धार

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धार और मालवा की सबसे पुरानी 40 पीरोंं की मजारें...🕌 कहते है गिनती करने पर मजारें कम~ज्यादा होती हैं ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) मालवा में इस्लाम कब और कैसे आया? ये खोज का विषय हो सकता है। क्योंकि मालवा की सरजमीं पर काफी कदीम (पुरानी) मजारें हैं । जैसे इंदौर के कड़ावघाट में हजरत मदार शाह रहमतुल्लाह अलैह का चिल्ला। जो करीब 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। ठीक ऐसी ही सबसे पुरानी मजारें हैं मध्यप्रदेश के धार इलाके में जिसे पीराने धार भी कहा जाता है। राजा भोज के जमाने में धार मालवा की राजधानी हुआ करता था जो तुगलक बादशाहों के जमाने यानि सन 1400 ईस्वी तक राजधानी रहा। पुराना धार वर्तमान धार के पश्चिमी~दक्षिण हिस्से में आबाद था। जहां राजा भोज के महल और विश्व प्रसिद्ध जौहरी बाजार आबाद था। आज से करीब 1000 साल पहले इस्लाम फैलाने तबलीगी काफिला जिसमें अल्लाह वालों की तादाद 40 थी धार आया। ये बात शाह अब्दुल्लाह शाह चंगाल सरकार से भी पहले की है। चालीस अफराद रात के अंधेरे में इसी पुराने धार में रुके । जहां राजा भोज के पुराने महल के खंडहरात और सरहदी दिवारे कायम थी। यहां पानी का एक मीठा कुंआ भी है।...

बुगड़े पीर धार वालों की दरगाह की कहानी

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बुगले/बड़े पीर उर्फ हजरत ताजुद्दीन अताउल्ला रह0 की रूहानी मजार और इस्लामपुरा टेकरी की फजीलत ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) आपको बुगले पीर क्यों कहा जाता है? इस मजार और धार टेकरी की क्या फजीलत है? इंदौर के पास आबाद धार शहर एक जमाने में मालवा की राजधानी हुआ करता था। राजा भोज के जमाने में जब 40 बेकसूर सहाबियों को शहीद करके एक कुंए में फेंका गया तब धार की धरती पर इस्लाम फैलाने की जिम्मेदारी शाह और बादशाहों को दी गई। नतीजन दूर~दराज़ से वली अल्लाह धार शहर में आकर इस्लाम फैलाने लगे। धार के गवर्नर और मालवा के सुल्तानो ने वलियों की खूब मदद की। धार और मांडव वलियों का गढ़ बन गया । धार/मांडव में पीर~फकीरों की तादात इतनी ज्यादा हो गई कि धार का नाम ही "पीराने धार" पड़ गया। धार आने वाले बुजुर्गों में चिश्ती और सोहरवर्दी सिलसिले के बुजुर्ग भी शामिल है। ऐसे ही सोहरवर्दी बुजुर्ग है हजरत बुगले पीर या बुगड़े पीर जिनका असली नाम रशीद शेख ताजुद्दीन अताउल्लाह है। (गुलजारे अबरार पेज 379)। हजरत बुगले पीर उर्फ ताजुद्दीन अताउल्लाह सरकार की दरगाह धार के बस स्टेंड के ठीक पीछे पूरब की तरफ बसी गुलमोहर कॉलो...

हज के लिए पैदल निकला केरल का शिहाब

हज के लिए पैदल निकला केरल का शिहाब 21वी सदी का पहला पैदल हजयात्री 🕋 ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) अल्लाह का घर देखने की तमन्ना हर मुसलमान की होती हैं। लेकिन हजारों किलोमीटर पैदल चलकर हज पर जाना हर किसी के बस की बात नहीं। लेकिन जब इरादे मजबूत हो तो मंजिल भी आसान हो जाती है। ऐसा ही नेक और मजबूत इरादा लेकर हज के लिए निकले है केरल के शिहाब छोत्तूर शिहाब पर ये शे'र बिल्कुल फिट बैठता है 👇 ख़ुद ही को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है? 🕋 शिहाब की रजा (मर्जी) और जिद अल्लाह का घर पैदल जाकर देखने की है। 🕋 हिंदुस्तान के आखरी छोर केरल के मलप्पुरम जिले के कोट्टक्कल के पास अठावनाड नामक इलाका है। यही के रहने वाले है शिहाब ।शिहाब जोखिम और तकलीफों से भरे लेकिन इस रूहानी सफर पर ऐसे दौर में निकले हैं जब सारी दुनिया में आपाधापी मची है। आज के दौर में पैदल हज यात्रा करना लगभग ना-मुमकिन सा है। फिर भी केरल के शिहाब छोत्तूर अल्लाह के घर को देखने के लिए पैदल-पैदल मक्का पहुंचने के लिए निकल पड़े है। वो अकेले ही पैदल चलकर 8,600 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी त...

हिंदी फिल्मों की सबसे पहली पार्श्वगायिका राजकुमारी की दर्दभरी दास्तान

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हिंदी फिल्मों की पहली पार्श्व गायिका राजकुमारी की दर्दभरी दास्तां ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) वो अपने नाम की तरह फ़िल्मी दुनिया की राजकुमारी थी। शुरुआती दौर में अमजद खान के वालिद जयंत के साथ हीरोइन बनकर खूब नाम कमाया। जब सेहत बढ़ने लगी और मोटापे ने आ घेरा तब उन्होंने हीरोइनों को अपनी मधुर आवाज़ देकर हिंदी फिल्मों में महिला प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत की। इस तरह राजकुमारी के नाम पहली महिला पार्श्व गायिका का रिकार्ड दर्ज हुआ।👍 जी हाँ राजकुमारी हिंदी फिल्मों की सबसे पहली प्लेबैक सिंगर थी। जोहर बाई अम्बालेवाली, अमीरबाई कर्नाटकी और शमशाद बेग़म जैसी गायिका में राजकुमारी की गिनती होती थी। 1931 में पहली बोलती फ़िल्म आलमआरा आ चुकी थी। बोलती फिल्मों की पहली हिरोईन जुबैदा से लेकर गौहरजान जैसी पुरानी हीरोइने अपनी क़ाबलियत , आवाज़ और फन के दम पर इंडस्ट्रीज में टिकी हुई थी। 1935 आते-आते फिल्मों में खूबसूरत हीरोइनों की इंट्री होने लगी जो दिखने में सुंदर लेकिन गाने में कमज़ोर हुआ करती थी। ऐसे में राजकुमारी ने उन्हे अपनी आवाज़ दी। हिरोइनों के साथ पार्श्वगायिकाएं भी चल पड़ी। 👍 पर्दे पर काजोल की नानी शोभना समर्...

नागदा नाम कैसे पड़ा?

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नागदा' नाम कैसे पड़ा? ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) दोस्तों इंदौर से करीब 115 किलोमीटर दूर एक नगर आबाद है। जिसका नाम #नागदा है। आज मैं आपको ये बताऊंगा कि इस जगह का नाम नागदा क्यों और कैसे पड़ा? और नागदा लफ्ज़ का मतलब क्या होता है? नागदा का सही उच्चारण नागदा नहीं बल्कि नाग+दाह (नागदाह) है , नागदाह यानि नागों को जलाना! #नागदाह का बिगड़ा नाम नागदा हुआ। अब बात करते है नागदाह नाम कैसे पड़ा? चूंकि इस जगह पर सांपों को जलाया गया था। इसलिए इस जगह का नाम नागदाह यानि नागदा पड़ा। अब बताता हूँ कि यहां सांपों को क्यों जलाया गया था। दोस्तों हम #हिंदुस्तान में रहते है । यहां की धरती पर हजरत #आदम अलैहि0 के उतरने से लेकर अब तक बहुत-सी यादगार और अजीबोगरीब घटनाएं घटी हैं। इन्हीं घटनाओं में से एक अनोखी घटना भगवत पुराण में भी लिखी है । महाभारत के #अर्जुन का नाम तो आप सभी ने सुना होगा। इन्हीं अर्जुन के बेटे थे अभिमन्यू। जब #महाभारत की जंग चल रही थी। तब #गुरुद्रोणाचार्य के बेटे अश्वस्थामा ने अर्जुन से अपने बाप गुरुद्रोणाचार्य की हत्या का बदला लेने के लिए अर्जुन की बहू उत्तरा (अभिमन्यु की बीवी) के गर्भ पर #...

इफ़्तार करवाने का सवाब

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इफ्तार करवाने का सवाब 👍 ✍️ जावेद शाह खजराना (दुआग़ो) हजरत #सलमान_फारसी रज़िअल्लाहु तआला ने कहा कि रसूल करीम ने फ़रमाया -' #रमज़ान में मोमिनों की रोजी बढ़ा दी जाती है। और जो शख्स हलाल रोजी में से रोजेदार को इफ़्तार कराएगा उसके गुनाहों की बख्शिश है और उसकी गर्दन #जहन्नुम से आज़ाद कर दी जाएगी। इफ़्तार कराने वाले को भी वही #सवाब मिलेगा जैसा सवाब #रोजा रखने वाले को मिलता है। (सुभान अल्लाह) 🌷 ये सुनकर सहाबियों ने अर्ज किया या #रसूलअल्लाह हम में से हर शख़्स रोजा खुलवाने की हैसियत नहीं रखता। हुजूर ने फरमाया -'#अल्लाह तआला की रहमत् के ख़ज़ाने में कोई कमी नहीं है अल्लाह उस शख्स को भी वही सवाब देगा को रोजेदार को सिर्फ एक घूंट #दूध या एक #खजूर या एक घूंट #पानी से #इफ्तार कराए।' 👍 जिस शख्स ने रोजेदार को भरपेट खाना खिलाया अल्लाह उसे मेरे जन्नती #हौज से पानी पिलाएगा। वो कभी प्यासा ना होगा। यहाँ तक कि इस नेक अमल के सदके में #जन्नत में दाखिल हो जाएगा। सुभान अल्लाह!!!💐💐💐 देखा दोस्तों रोजा खुलवाने की भी कितनी फजीलतें है। बहैसियत हम लम्बी-चौड़ी दावत न सही रोजदार को कम से कम पानी और खजू...

अबु हुरैरा रजि0 की 21 बरकती खजूरें

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*अबु हुरैरा रजि0 की 21 खजूरें जिसमें रसूलअल्लाह ने ऐसी बरकत डाली जो कभी ख़त्म नही होती थी* ✍️ *जावेद शाह खजराना (लेखक)* दोस्तों ये बात सच्ची और इबरत भरी है। अल्लाह ने अपने नबी पर क़ुरआन उतारा। हजरत अबु हुरैरा रजि0 को क़ुरआन याद था। रसूलअल्लाह ने जो नसीहतों भरी बातें बताई वो लिख ली गई। जिसे हदीस कहते है। सबसे ज्यादा हदीस हजरत अबु हुरैरा रजि0 को ही याद थी । उन्होंने तकरीबन 5374 हदीसें लिखी हैं। ये एक अज़ीम रिकार्ड है। जो किसी सहाबी के नाम दर्ज नहीं हुआ। ये सारा इल्म उन्हें प्यारे आका की सोहबत से हासिल हुआ। अबु हुरैरा हमेशा प्यारे नबी की महफिलों में बैठा करते उनकी बातों को गौर से सुनते। याद कर लेते। प्यारे नबी की सोहबत में उन्होंने समझो दुनिया से नाता तोड़ रखा था। उनके सिर्फ 2 ही काम थे इबादत करना और बाकी वक्त रसूलअल्लाह की चौखट पर गुजारना। जो भी रूखा-सूखा रसूलअल्लाह के दर से मिलता खा लिया करते और बचकुचा अपनी बूढ़ी माँ के लिए भी ले जाते। कभी-कभार ऐसे भी हालात पेश आते कि आपको खाने की कोई चीज मयस्सर नहीं होती। कई -कई दिन फाँकों में गुज़ार देते लेकिन मुँह से उफ़्फ़ तक नहीं करते। उनकी बूढ़ी वालि...

ख्वाज़ा की चौखट पर जब मेहबूब साहब ने निम्मी की मां वहीदन बाई की खोज की

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ख्वाज़ा की चौखट पर जब मेहबूब साहब ने निम्मी की मां वहीदन बाई की खोज की ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) सन 1931-32 के आसपास की बात है। फ़िल्म डायरेक्टर मेहबूब साहब उर्स के मौके पर अजमेर स्थित ख्वाज़ा गरीब नवाज रह0 की मज़ार पर मौजूद थे। गरीब नवाज के आस्ताने पर देशभर से आए गाने-बजाने वाले हाज़िर होकर अपने हुनर की कलाबाजियां दिखा रहे थे। जिनमें मशहूर तवायफें भी शामिल थी। अचानक मेहबूब साहब के कानों में जादूभरी आवाज़ पड़ी। उन्होंने देखा कि एक महिला बहुत सी कर्णप्रिय आवाज से गा रही है। उन्होंने कहा। अरे बाप रे ये गायिका तो जादूगर है। ख्वाजा गरीब नवाज के आस्ताने के बाहर एक खूबसूरत औरत अपने साजिंदों के साथ बहुत ही खूबसूरती से नात और क़व्वाली पढ़ रही है। मेहबूब साहब चूंकि फ़िल्म डायरेक्टर थे फौरन उनके दिमाग में उस औरत की खूबसूरत आवाज और काबलियत को फिल्मों के जरिये सारे हिंद में पेश करने का ख्याल आया। क़व्वाली के प्रोग्राम के बाद मेहबूब साहब ने उस महिला को अपना तआरुफ़ दिया। महिला ने अपना नाम वहीदन बाई बताया जो आगरा से अपने शौहर नवाब के साथ ख्वाजा के दरबार में जियारत और कलाम पेश करने आई थी। मेहबूब साहब ने...

डांसिंग गुरु बेग़म अतिया फ़ैज़ी राहमीन

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डांसिंग गुरु..🤸 हिंदी सिनेमा को सबसे पहली आयटम गर्ल देने वाली फ़नकारा बेग़म अतिया फ़ैज़ी राहमीन ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) फिल्मों से अगर गीत-संगीत और मचलते डांस को हटा दिया जाए तो #फ़िल्म संसार लगभग बेजान-सा नजर आएगा। गीत-संगीत और #डांस के बगैर फ़िल्म संसार का तसव्वुर बेमानी है। फिल्मों का डांस और #कैबरे देखकर ना जाने कितने लोग थिरके है। डांस बालाओं को देखकर ना जाने कितनों के दिल धड़के हैं। आज हम दिल को धड़काने वाली इंडियन फिल्मों की ऐसी ही खूबसूरत और सबसे पहली डांसर/आयटम गर्ल और उनकी आला उस्ताद के बारे में जानेंगे जिनके दिवाने #हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि #पाकिस्तान में भी हैं। उनके कद्रदानों में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली #जिन्ना से लेकर शिबली नोमानी औऱ #अल्लामा_इक़बाल जैसे आलातरीन नाम भी शरीक हैं। हिंदी फिल्मों के शौकीन सिर्फ इतना जानते है कि हिंदी फिल्मों की सबसे पहली आयटम गर्ल #हेलन है। जानकार लोग हेलेन को डांस सिखाने वाली उनकी गुरु #कुक्कू_मोरे का नाम ले लेते है। लेकिन जो फिल्मी दुनिया के महाज्ञानी है वो #कुक्कू की भी उस्ताद का नाम बड़े अदब से मेडम अजुरी बताते है। बस इसके आगे ...

पार्श्वगायक महेंद्र कपूर इंदौर में

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चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) आज महेंद्र कपूर की 88वी वर्षगाठ है। इसलिए आज मैं महेंद्र कपूर की इंदौर यात्रा के बारे में बताऊंगा। आज से 25 साल पहले की बात है। 22 जून सन 1997 बरोज इतवार की सुबह थी। पार्श्वगायक महेंद्र कपूर अपने बेटे रोहन कपूर के साथ मालवीय नगर रिंगरोड पर एक संगीत एकेडमी का उद्घाटन करने आए थे। सुबह-सुबह मालवीय नगर दरगाह के क़रीब संगीत संस्थान में महेंद्र कपूर को देखने और सुनने वालों की भीड़ थी। गर्मी का मौसम में माहौल में भी गर्मी थी। जानेमाने लीजेंड मेरे फेवरेट सिंगर को देखने मैं भी पहुँच गया। महेंद्र कपूर साहब ने यहां कुछ खास नहीं गाया क्योंकि संगीत का रंगारंग प्रोग्राम तो दोपहर में रवींद्र नाट्यगृह में रखा गया था। रिंगरोड नया-नया बना था। फिर भी भीड़ थी। भीड़भाड़ होने की वजह से मुझे ऑटोग्राफ लेने का कोई मौका नहीं मिला। संगीत एकेडमी के डॉयरेक्टर से मेरी जान-पहचान थी। इसलिए प्रोग्राम में आने-जाने में मुझे कोई रुकावट नहीं थी। ख़ैर दोपहर 1 बजे में रविन्द्र नाट्यगृह में पहले 'आओ-पहले पाओ' की तर्ज पर कुर्सी पर काबिज हो गया। मैंने प...

इंदौर के मंडलोई जी ने बनाई थी रानी रूपमती फ़िल्म

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इंदौर के मंडलोई जी ने बनाई थी रानी रूपमती फ़िल्म❤️ ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) वैसे तो हमारे इंदौर में फिल्मों की शुटिंग की इब्तिदा सन 1950 में भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म 'आन' से हो चुकी थी। बाद में भी कई सुपर हिट फिल्मों की शूटिंग यहाँ हुई। किस्मत की बात है कि इंदौर और आसपास फिल्माई गई सभी फिल्मों ने गौरवशाली इतिहास रचा है। इंदौर और खजराना में 'आन' की शूटिंग के बाद देवास के शाजापुर में श्री 420 और भोपाल के बुधनी में नयादौर फ़िल्म की शूटिंग हुई। ये सभी कामयाब फ़िल्में थी। ऐसे में इंदौर के प्रोड्यूसर कैसे खामोश बैठते? रानी रूपमती के गढ़ निमाड़ अंचल से ताल्लुक़ रखने वाले मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मरहूम श्री भगवंतराव मंडलोई साहब के परिवार से जुड़े इंदौर निवासी जनाब आर0एन0 मंडलोईजी ने सन पचास के दौर में सती नागकन्या, महासती सावित्री, राम -हनुमान युद्ध से लेकर जय गणेश तक आधा दर्जन धार्मिक ऐतिहासिक फि़ल्में बनाईं थी लिहाज़ा उन्होंने अपने इलाके की मशहूर प्रेमकथा को पर्दे पर साकार करने का इरादा किया। जी हाँ दोस्तों 1957 की सुपरहिट फिल्म रानी रूपमती के प्रोड्यूसर आर0एन0मंड...

कॉमेडियन राजेंद्र नाथ और उनकी बहन कृष्णा राजकपूर

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Comedian Rajendra Nath and His Sister Krishna Raj Kapoor

नादिरा की रज़ाई में जब मुकरी घुस गए

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जब नादिरा की रज़ाई में घुस गए थे मुकरी ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) सारे भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। रज़ाई में घुसते हुए मुझे एक मज़ेदार किस्सा याद आ गया सन 1950 की बात है। हुआ यूँ की फ़िल्म डॉयरेक्टर #महबूब_खान साहब इंदौर में अपनी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, फिल्म का नाम था , #आन … फ़िल्म की पूरी यूनिट #लैंटर्न होटल #यशवंत_निवास रोड़ पर रुकी हुई थी …सभी को अलग-अलग कमरे दिए गए थे … मगर कॉमेडियन #मुकरी साहब ने ये कह दिया किया, कि उनके रूम का सामान उनके दोस्त दिलीप कुमार के कमरे में रख देना वो उनके साथ ही रूम शेयर करेंगे । अब हुआ यूँ की पहले दिन शूटिंग का पैक अप देर रात हुआ । सर्दियों का मौसम था । शबे #मालवा तो वैसे भी मशहूर है और आजकल की ठंड उस वक्त के हिसाब से रत्तीभर भी नहीं। सारा #इंदौर कोहरे की चादर ओढ़े हुए था। मुकरी साहब भूल गए की उनका सामान #दिलीप_कुमार के रूम में रखा है । जब मुकरी साहब अपने कमरे में गए तो उनके कमरे में रजाई वगैरह नहीं थी, अब भरी सर्दी में बिना रजाई के सोना मुश्किल था तब वो दिलीप कुमार के कमरे में सोने चल दिए… जब वो दिलीप कुमार का कमरा ढूंढ रहे थे तब होटल मे...

Indori Tadka

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पटेल साहब का इंदौरी तड़का ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) मेहमान-नवाज़ी इन्हें विरासत में मिली है। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ शिरीन अख़लाक़ के मालिक जनाब मोहम्मद इश्हाक पटेल साहब की।👍 आज़ाद नगर निवासी इश्हाक पटेल साहब के हाथों में क़माल है आप बेहतरीन लेखक के साथ लाजवाब खानसामा भी है। आपके हाथों के लजीज खानों का लुत्फ फ़िल्म स्टारों से लेकर नामी-गिरामी राजनीतिज्ञों ने उठाया हैं इश्हाक पटेल साहब के हाथों में कमाल है आपने "इंदौरी तड़का' नाम से रेस्टारेंट खोला है। इनके बेटे जिशान पटेल भाई इनके कारोबार में हाथ बंटाते है। अल्लाह इश्हाक पटेल साहब के कारोबार में खूब बरकत अता करें। #javedShahKhajrana

ताजिया के मायने क्या है?

ताज़िया के मायने? ✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक) ताज' से ताजिया लफ्ज़ बना। ताज जो सर के ऊपर पहना जाता है , ठीक उसी प्रकार गुम्बद भी मक़बरे का ताज ही होता है। इसलिए हजरत ईमाम हुसैन रजि0 के मक़बरे की डिजाइन (नकल/Model) को ताज़िया कहते है। वैसे ताजियत के मायने शोक भी होते है। ताजिया को शोक' मनाने का मकाम भी कहा जाता है। शिया समुदाय ताजिये के मायने 'शोक' (दुख) मनाता है। ताजिया यानि ईमाम हुसैन के मक़बरे की डिजाईन 👍 इस विषय पर लिखने से ज्यादातर लोग कतराते है। क्योंकि लोगों ने ताजिया लफ्ज़ को आस्था से जोड़ रखा है । इसलिए मैं विवादित बयान से बचूंगा सिर्फ मालूमाती पोस्ट लिख रहा हूँ। अंजाने में कोई गलती हो जाए तो प्लीज माफ कर देना। मुख्तसर में ताज़िया' हजरत इमाम हुसैन रजि0 के मक़बरे की डिजाइन है। लेकिन ये मक़बरे की डिजाईन भी असली नहीं है। क्योंकि लोग ताजिया अपने-अपने हिसाब से बना लेते है। जबकि हजरत इमाम हुसैन रजि0 के हकीकी मक़बरे के बारे में भी बहुत-सी गलत-फहमियां फैली है। यानि हजरत इमाम हुसैन के सर और धड़ पर बने बहुत-से मक़बरे दुनियाभर में मौजूद है।😢 असली मक़बरा कौन-सा है? कोई नही...

बुढ़िया और सोहन हलवा

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*कंजूस बुढ़िया और सोहन हलवा*😊 ✍️ *जावेद शाह खजराना (लेखक)* *ख़्वाजा जी की दरग़ाह के ठीक सामने बने बेगमी दालान के सहन में बैठा मुंहबोली ख़ाला से तारागढ़ चलने की जिद कर रहा था। इतने में कंजूस बुढ़िया ने भांजी मार दी।😏* *बूढ़ापे और थकान का बहाना करके ख़ाला को भी भड़का दिया , सो उन्होंने भी पहाड़ चढ़ने से इनकार कर दिया।😭* *बुढ़िया मुझसे बोली- 'मुझे सोहन हलवा तो दिला लाओ।'* *मुझे कंजूस अम्मा की रेल वाली 2 रुपए की सेंव की पुड़िया याद थी। इसलिए ख़ाला से कहा - 'रहने दो ख़ाला ! ये अम्मा लेगी-वेगी कुछ भी नहीं जबरन का थकायेगी ।' ☺️* *'नहीं बेटा मुझे तबर्रुक लेना है । तू मुझे दिला ला तुझे भाव-ताव करना भी आता है।'* *अम्मा ने मेरी तारीफ़ करके ताव पर चढ़ा दिया।😁* *सोहन हलवा खरीदना कौन-सी बड़ी बात है🤔* *इसलिए अम्मा को लेकर मैं निज़ामी गेट के सामने दरगाह बाजार पहुंचा।* *अज़मेर में सोहन हलवा खरीदना या उसका भाव पूछना बहुत रोचक रहता है । खरीदार को सिर्फ भाव पूछने भर की देर रहती है । दुकानदार फौरन सरोते से सोहन हलवा काटकर टुकड़ा चखने के लिए आगे बढ़ा देता है।* 😉  *स्वाद और भाव पसंद आए तो ठीक वरना अग...

बिटको दंत मंजन की भूली बिसरी यादें

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 किस-किसने चमकाए है दाँत 😀 बिटको के काले मंजन से 😁😁 ✍ जावेद शाह खजराना (लेखक) बिटको के काले मंजन की ये नंन्ही काँच की शीशी नई जनरेशन के लिए अजूबा जरूर हो सकती है ,लेकिन हमारे बचपन में सुबह की शुरुआत इससे निपटकर ही होती थी। 😃 कभी मार खाकर तो कभी बेमन उसे मुँह लगाना ही पड़ता। इस भागम-भाग जिंदगी में हम बहुत सी बातें लगभग भूल चुके है , जो कभी रोजमर्रा ज़िंदगी का अंग हुआ करती थी । इन भूली बिसरी यादों को हमने कभी शेअर भी नही किया , इसलिए आजकल की नई पीढ़ी इस बारे में बिल्कुल भी नहीं जानती। 😊 लेकिन 1980-90 से लेकर 2000 दशक तक बिटको एक जाना -पहचाना नाम था।👍 जो लोग इस काले मंजन से दूर भागते उन्हें भी ये गाँव-खेड़ों में बसे दादा-दादी या नाना-नानी के यहाँ पाहुना बनने अक्सर दिख जाया करता।☺ कभी खुशी-खुशी  , तो कभी नाक मुंह सिकोड़कर इसे मजबूरन वापरना ही पड़ता। खैर सबकी लाचारी भी रहती कि चलो भईया कोयले के खुरदुरेपन से तो ये बिटको ही भला। कुल मिलाकर बिटको अपने बचपन में जानी- पहचानी वस्तु थी , जिसे हमें बरसों तक झेलना पड़ा। 😀 दोस्तों पुराने ज़माने की बातें भी निराली थी। वो दिन भी क्या दिन थे 😑 ...

2 जून की रोटी

 2 जून की रोटी...👍 ✍ जावेद शाह खजराना (लेखक) दोस्तों आज 2 जून है। कोरोना महामारी औऱ लॉकडाउन जैसी समस्या से हम सभी जूझ रहे है। महंगाई रूपी डायन ने एक भी घर को नही छोड़ा बल्कि अपने असर से सभी रसोईघरों के बजट को तेल से लेकर आटे तक के भाव ने बिगाड़ दिया है। पिछले लॉकडाउन से लेकर अब तक अकेले सोयाबीन तेल का भाव ढाई गुना बढ़ गया है। इसकी देखदेखी बाकी तेल भी नखरे दिखाने लगे।  महंगाई रूपी इस डायन ने अमीर-गरीब सबको हिला कर रख दिया है। ऐसे में ये कहावत सही साबित नजर आने लगी है कि 2 जून की रोटी कमाना भी महंगा पड़ रहा है। दोस्तों 2 जून यानि 2 वक्त  हम दो अप्रेल या दो मई की रोटी क्यों नहीं कहते ? क्योंकि दो जून की रोटी का मतलब कोई महीना नहीं, बल्कि दो समय (सुबह-शाम) का खाना होता है।  यहाँ जून से मुराद जून का महीना नहीं है। बल्कि अवधि भाषा में वक्त या समय को जून कहते है। अवधी भाषा से जन्मा है दो जून की रोटी । इससे ही यह कहावत वजूद में आई। आम शब्दों में बतौर कहावत इसके मायने कड़ी मेहनत के बाद भी लोगों को दो समय का खाना नसीब नहीं होना, होता है। #javedshahkhajrana

2 जून की रोटी

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 2 जून की रोटी...👍 ✍ जावेद शाह खजराना (लेखक) दोस्तों आज 2 जून है। कोरोना महामारी औऱ लॉकडाउन जैसी समस्या से हम सभी जूझ रहे है। महंगाई रूपी डायन ने एक भी घर को नही छोड़ा बल्कि अपने असर से सभी रसोईघरों के बजट को तेल से लेकर आटे तक के भाव ने बिगाड़ दिया है। पिछले लॉकडाउन से लेकर अब तक अकेले सोयाबीन तेल का भाव ढाई गुना बढ़ गया है। इसकी देखदेखी बाकी तेल भी नखरे दिखाने लगे।  महंगाई रूपी इस डायन ने अमीर-गरीब सबको हिला कर रख दिया है। ऐसे में ये कहावत सही साबित नजर आने लगी है कि 2 जून की रोटी कमाना भी महंगा पड़ रहा है। दोस्तों 2 जून यानि 2 वक्त  हम दो अप्रेल या दो मई की रोटी क्यों नहीं कहते ? क्योंकि दो जून की रोटी का मतलब कोई महीना नहीं, बल्कि दो समय (सुबह-शाम) का खाना होता है।  यहाँ जून से मुराद जून का महीना नहीं है। बल्कि अवधि भाषा में वक्त या समय को जून कहते है। अवधी भाषा से जन्मा है दो जून की रोटी । इससे ही यह कहावत वजूद में आई। आम शब्दों में बतौर कहावत इसके मायने कड़ी मेहनत के बाद भी लोगों को दो समय का खाना नसीब नहीं होना, होता है। #javedshahkhajrana

2 जून की रोटी

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 2 जून की रोटी...👍 ✍ जावेद शाह खजराना (लेखक) दोस्तों आज 2 जून है। कोरोना महामारी औऱ लॉकडाउन जैसी समस्या से हम सभी जूझ रहे है। महंगाई रूपी डायन ने एक भी घर को नही छोड़ा बल्कि अपने असर से सभी रसोईघरों के बजट को तेल से लेकर आटे तक के भाव ने बिगाड़ दिया है। पिछले लॉकडाउन से लेकर अब तक अकेले सोयाबीन तेल का भाव ढाई गुना बढ़ गया है। इसकी देखदेखी बाकी तेल भी नखरे दिखाने लगे।  महंगाई रूपी इस डायन ने अमीर-गरीब सबको हिला कर रख दिया है। ऐसे में ये कहावत सही साबित नजर आने लगी है कि 2 जून की रोटी कमाना भी महंगा पड़ रहा है। दोस्तों 2 जून यानि 2 वक्त  हम दो अप्रेल या दो मई की रोटी क्यों नहीं कहते ? क्योंकि दो जून की रोटी का मतलब कोई महीना नहीं, बल्कि दो समय (सुबह-शाम) का खाना होता है।  यहाँ जून से मुराद जून का महीना नहीं है। बल्कि अवधि भाषा में वक्त या समय को जून कहते है। अवधी भाषा से जन्मा है दो जून की रोटी । इससे ही यह कहावत वजूद में आई। आम शब्दों में बतौर कहावत इसके मायने कड़ी मेहनत के बाद भी लोगों को दो समय का खाना नसीब नहीं होना, होता है। #javedshahkhajrana